Saturday, April 15, 2017

क्यूँ आज कहानी लिखता चला

सर्द सी सुबह और कोहरे की छाँव ,
भविष्य की किरण की क्षीड़ सी बांह ,
फिर भी उस लकीर की ओर बढ़ता गया,
क्यूँ  आज  कहानी लिखता चला | 

बचपन की नींव अब जीवन जीना सिखाती है ,
कितनी ठोकर खाई ,वही मेरी राह बनती है | 
जीवन का सारांश अँधेरे से उजाले तक कहता चला ,
क्यूँ  आज  कहानी लिखता चला | 

यौवन की बेला ने कितने हाथ पकडे,
मेरे जीवन ने उन्हें अपने समझे,
पर समय का कालचक्र ये बंधन छोड़ता चला ,
क्यूँ  आज  कहानी लिखता चला | 

आज की सुबह कुछ नयी तो नहीं थी,
पर बीते पलछिन दिमाग में उलझ से रहे थे,
कभी माँ की गोद , कभी नानी की कहानी याद आई ,
कभी प्रेम से भरे उसके नयन, तो कभी शिशु की किलकारी  याद आई | 

ये बावरा मन खोये हुए पलों को संजोता चला गया,
क्यूँ  आज  कहानी लिखता चला |